ब्राह्मणवाद दुनिया का सबसे खतरनाक आतंकवाद है!

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ब्राह्मणवाद दुनिया का सबसे खतरनाक आतंकवाद है. क्योंकि इसकी वजह से जो मार खाता है, उसे कोई शिकायत नहीं है. वह मजे से मार खाता है, ताकि उसका परलोक सुधर जाए. वह अपमानित होता है और अपमानित करने वाले को दक्षिणा भी देता है. इटली के समाजशास्त्री अंतोनियो ग्राम्शी इसे ‘हेजेमनी बाई कंसेंट’ कहते हैं. यानी पीड़ित की सहमति से चल रहा वर्चस्ववाद. इसके लिए सहमति की संस्कृति बनाई जाती है. यही ब्राह्मण धर्म है. बहुजनों की सहमति से अल्पजन का राज. इसका सबसे बुरा असर यह है कि अपार प्राकृतिक संसाधनों के बावजूद भारत आज दुनिया के सबसे गरीब, निरक्षर, बीमार और लाचार देशों में एक है. जीवन के हर क्षेत्र में सवर्ण वर्चस्व ने देश का बुरा हाल कर दिया है.

क्या आपने कभी सोचा है कि 1946-47 की विश्व इतिहास की भीषणतम सांप्रदायिक हिंसा के दौर में, जब 10 लाख से ज्यादा लोग मारे गए, तब भी बाबा साहेब जातिमुक्त भारत के बारे में ही लिख रहे थे? बाबा साहेब जानते थे कि भारत के ज्यादातर लोगों की समस्या जाति है. उससे मुक्ति जरूरी है. यही भारत की असली आजादी है. यही राष्ट्र निर्माण है.

लेकिन यूनियन कैबिनेट में कुल 26 मंत्री हैं. जिनमें…

गृहमंत्री : राजपूत

कृषि मंत्री : राजपूत

ग्रामीण विकास: राजपूत

रक्षा मंत्री : ब्राह्मण

वित्त मंत्री : ब्राह्मण

रेल मंत्री : ब्राह्मण

विदेश मंत्री : ब्राह्मण

शिक्षा मंत्री : ब्राह्मण

सड़क परिवहन मंत्री : ब्राह्मण

स्वास्थ्य मंत्री: ब्राह्मण

कैमिकल मंत्री : ब्राह्मण

पर्यावरण मंत्री : ब्राह्मण

खादी मंत्री : ब्राह्मण

कपड़ा मंत्री : ईरानी ब्राह्मण

स्टील मंत्री : जाट

क़ानून मंत्री : कायस्थ

संचार मंत्री : कम्मा(पिछड़ा)

खाद्य मंत्री : दलित

इनकी टैलेंट और मेरिट की फैक्ट्री महाराष्ट्र में लगी है। इन नौ भूदेवों में चार अकेले महाराष्ट्र के. महाराष्ट्र के लोगों को बधाई. मोहन भागवत को पेशवा राज स्थापित होने पर बधाई.

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दैनिक जागरण के मालिक ने अखिलेश यादव से पूछा था कि यूपी पुलिस में कितने यादव हैं. अब वे नरेंद्र मोदी से पूछ सकते हैं कि उनकी लगभग आधी कैबिनेट एक ही जाति से क्यों भरी हुई है.

यादव = 00

कुर्मी, पटेल = 00

जाटव = 00

कुशवाहा, मौर्या = 00


मल्लाह, निषाद = 00

लिंगायत = 00

अंसारी, जुलाहा = 00

वन्नियार = 00

कपू = 00

नायर = 00

और संख्या की दृष्टि से ये भारत की कुछ सबसे बड़ी जातियां हैं. ऐसे में 26 में से 9 मंत्री एक ही जाति से बनाना और वह भी उस जाति से जिसकी संख्या काफी कम है, एक गहरे सामाजिक असंतुलन की ओर संकेत करता है.

 

यह जरूर है मनुस्मृति के हिसाब से चलने वाली केंद्र सरकार कि कैबिनेट मंत्रियों के पदों को पाँच को छोड़कर सभी को सवर्णों से भरने के बाद, राज्य मंत्रियों यानी जूनियर मिनिस्टर बनाने में सामाजिक संतुलन का ध्यान रखा गया है  और जूनियर मंत्री पदों पर SC, ST, OBC को जगह दी गई है। लेकिन वहां भी स्वतंत्र प्रभार देने में खेल किया गया है.

 

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21 COMMENTS

  1. Khalaf Al-Harbi is a liberal columnist and a thinker from Saudi Arabia. His liberal views and objective columns on various issues are a big hit and widely discussed across the world.

    In his latest column in ‘Saudi Gazette’, he heaps praises over India describing it as the most tolerant nation on the earth. In his column titled ‘India – A country that rides elephants’,
    Khalaf Al Harbi writes: “In India, there are more than 100 religions and more than 100 languages. Yet, the people live in peace and harmony. They have all joined hands to build a strong nation that can produce everything from a sewing needle to the rocket which is preparing to go to Mars. I must say that I feel a bit jealous because I come from a part of the world which has one religion and one language and yet there is killing everywhere. No matter how the world speaks about tolerance, India remains the oldest and most important school to teach tolerance and peaceful co-existence regardless of the religious, social, political or ethnical differences.”

    ?This is what we need to share in WhatsApp groups proud to be an Indian

  2. I really pity on you Dilip mandal.

    Today Journalism must be feeling shameful as it has journal like you who try to divide the society on caste basis when whole country is trying for 1 Country 1 Caste – India.

    Shame on you….

  3. …यह लिखने से पहले आप थोड़ा और ज्ञान अर्जित और शोध कीजिये आपको पता होगा की भारत राज्यो का समूह है तो आप पहले राज्य का वर्णन क्यों नहीं करते बिहार, उत्तरप्रदेश जो देश की राजनीती लिखता है यहाँ का मंत्रिमंडल का है ज्ञान आपको ? जरा इसे भी दिखाओ और लिखो। पिछले दिनों की घटना याद है आपको ? कैसे एक दलित मुख्यमंत्री को अपने कुर्सी के लिए अपमानित कर हटाया गया था, हटाने बाला क्या ब्राह्मण था? बिहार कैबिनेट में कितने ब्राह्मण है ? यूपी कैबिनेट में कितने ब्राह्मण है। आप थ्योरी लिखते हो हम प्रैक्टिकल करते है । उदाहरण बहुत है पर एक ताजा उदाहरण बिहार के चर्चित मंत्रालय के मंत्री का जिससे राज्य के लगभग 100 प्रतिशत जनता जुड़े हुए है।अभी से पहले इस मंत्रालय का मंत्री स्वर्ण जाती के थे और अन्य जाती के वो लोगो की समस्या सुनने के लिए हर दिन ऑफिस से लेकर घर तक लोगो का फरियाद सुनते थे आगंतुको को बैठने के लिए एक हॉल दिए थे आज सब बदल गया है क्योंकि अब मंत्री एक दलित बन गए है तो इनसे मिलना और दिली पैदल जाना बराबर है। ये आज तक किसी को अपने चैम्बर में घुसने नहीं देते है बहुत लोगो का प्रेशर रहा तो दरबाजे के बाहर मिल लेते है जैसे किसी मंदिर और मस्जिद के सामने के भिखारी भीख मांगने आया हो, और बैठने की जो हॉल था उसे बंद करबा दिया की सब बहुतलोग मिलने आ जाता है। ये है असली दलितगिरी जो अग्रेजो के शासन से कम नहीं है। जिसे जहाँ मौका मिलता है सब अपनी दादागिरी चलाता है । ऐसे उदाहरण एक नहीं हजारो मिल जायेंगे। पुरे देश में जाती व्यवस्था हावी है और यह सिर्फ ब्रह्ममनबाद नहीं है सभी जाती के लोग इस इंतजार में बैठा है कि कब हमें मौका मिले की हम कुछ अपने जाती के लिए कर पाये। ऐसा कोई भी राज्य भारत में नहीं है जो किसी एक जाती से बना हो हर राज्य में हर जाती के लोग रहते है और हर जाती का राज्यो में एक सुरक्षित छेत्र है।जिस छेत्र में जिस जाती का जनसँख्या अधिक होती है वहाँ वो अपने छेत्र में दादागिरी, अत्याचार, करता है। अगर और नजदीक से जाती को देखना है तो भारत में हजारों जाती है। हर राज्यो में गांव होता है सभी गांवो में किसी एक जाती की जनसँख्या अधिक होती है जिसकी जनसँख्या अधिक होती है उस गांव में निम्न जनसँख्या बालो लोगो को प्रताड़ित करते है चाहे वो ब्राह्मण , दलित, आदिबासी, पिछड़ा या अन्य पिछड़ा जाती का हो जिसे जितना मौका मिलता है वो अपने से कम जनसँख्या बाले जाती को प्रताड़ित कर रहा है। यही सचाई है भारत में जातियों का। अगर आप उसे जाती के नाम पर वोट देना बंद कर दो कल वो भी अपने जाती का मंत्री बनाना बंद कर देगा।अगर आप विकास और अन्य आवश्यकताओं को देख कर वोट करो तो जितने वाला भी आपको विकास के रूप में ही देखेगा। लिखना ही है तो स्पष्ट लिखो आजाद होकर लिखो आप के अंदर एक जाती की बू आ रही है इसलिए आप स्पष्ट नहीं लिख पा रहे हो। अपने अंदर के जाती को पहले जलाओ तब सत्य लिख पाओगे। इस पोस्ट को मेरे कोई भी दोस्त अन्यथा नहीं लेंगे।

  4. यह पोस्ट किसी जाति के लिए नहीं वरन ब्राह्मणों के विरुद्ध समाज में फैलाई जा रही नकारात्मकता के बारे में है कृपया धैर्य से पूरा पढ़ें तभी प्रतिक्रिया दें –
    क्या आधुनिक भारत में ब्राह्मणों की दुर्दशा तर्कसंगत
    है?

    जिन लोगों ने भारत को लूटा, तोडा, नष्ट किया, वे आज इस देश में ‘अतीत भुला दो’ के नाम पर सम्मानित हैं और एक अच्छा जीवन जी रहे हैं। जिन्होंने भारत की मर्यादा को खंडित किया, उसके विश्विद्यालयों को विध्वंस किया, उसके विश्वज्ञान के भंडार पुस्तकालयों को जला कर राख किया, उन्हें आज के भारत में सब सुविधाओं से युक्त सुखी जीवन मिल रहा है।
    किंतु वे ब्राह्मण जिन्होंने सदैव अपना जीवन देश, धर्म और समाज की उन्नति के लिए अर्पित किया, वे आधुनिक भारत में “काल्पनिक” पुराने पापों के लिए दोषी हैं।

    आधुनिक इतिहासकार हमें सिखाते हैं कि भारत के ब्राह्मण सदा से दलितों का शोषण करते आये हैं जो घृणित वर्ण-व्यवस्था के प्रवर्तक भी हैं।
    ब्राह्मण-विरोध का यह काम पिछले दो शतकों में कार्यान्वित किया गया।
    वे कहते हैं कि ब्राह्मणों ने कभी किसी अन्य जाति के लोगों को पढने लिखने का अवसर नहीं दिया।
    बड़े बड़े विश्वविद्यालयों के बड़े बड़े शोधकर्ता यह सिद्ध करने में लगे रहते हैं कि ब्राह्मण सदा से समाज का शोषण करते आये हैं और आज भी कर रहे हैं, कि उन्होंने हिन्दू ग्रन्थों की रचना केवल इसीलिए की कि वे समाज में अपना स्थान सबसे ऊपर घोषित कर सकें…
    किंतु यह सारे तर्क खोखले और बेमानी हैं, इनके पीछे एक भी ऐतिहासिक प्रमाण नहीं। एक झूठ को सौ बार बोला जाए तो वह अंततः सत्य प्रतीत होने लगता, इसी भांति इस झूठ को भी आधुनिक भारत में सत्य का स्थान मिल चुका है।
    आइये आज हम बिना किसी पूर्व प्रभाव के और बिना किसी पक्षपात के न्याय बुद्धि से इसके बारे सोचे, सत्य घटनायों पर टिके हुए सत्य को देखें।
    क्योंकि अपने विचार हमें सत्य के आधार पर ही खड़े करने चाहियें, न कि किसी दूसरे के कहने मात्र से।

    खुले दिमाग से सोचने से आप पायेंगे कि ९५ % ब्राह्मण सरल हैं, सज्जन हैं, निर्दोष हैं। आश्चर्य है कि कैसे समय के साथ साथ काल्पनिक कहानियाँ भी सत्य का रूप धारण कर लेती हैं। यह जानने के लिए बहुत अधिक सोचने की आवश्यकता नहीं कि ब्राह्मण-विरोधी यह विचारधारा विधर्मी घुसपैठियों, साम्राज्यवादियों, ईसाई मिशनरियों और बेईमान नेताओं के द्वारा बनाई गयी और आरोपित की गयी,ताकि वे भारत के समाज के टुकड़े टुकड़े करके उसे आराम से लूट सकें।
    सच तो यह है कि इतिहास के किसी भी काल में ब्राह्मण न तो धनवान थे और न ही शक्तिशाली। ब्राह्मण भारत के समुराई नहीं है। वन का प्रत्येक जन्तु मृग का शिकार करना चाहता है, उसे खा जाना चाहता है, और भारत का ब्राह्मण वह मृग है। आज के ब्राह्मण की वह स्थिति है जो कि नाजियों के राज्य में यहूदियों की थी। क्या यह स्थिति स्वीकार्य है? ब्राह्मणों की इस दुर्दशा से किसी को भी सरोकार नहीं, जो राजनीतिक दल हिन्दू समर्थक माने गए हैं, उन्हें भी नहीं।

    ब्राह्मण सदा से निर्धन वर्ग में रहे हैं!
    क्या आप ऐसा एक भी उदाहरण दे सकते हो जब ब्राह्मणों ने पूरे भारत पर शासन किया हो? (चाणक्य ने चन्द्रगुप्त मौर्य की सहायता की थी एक अखण्ड भारत की स्थापना करने में। भारत का सम्राट बनने के बाद, चन्द्रगुप्त चाणक्य के चरणों में गिर गया और उसने उसे अपना राजगुरु बनकर महलों की सुविधाएँ भोगते हुए, अपने पास बने रहने को कहा। चाणक्य का उत्तर था: ‘मैं तो ब्राह्मण हूँ, मेरा कर्म है शिष्यों को शिक्षा देना और भिक्षा से जीवनयापन करना।
    क्या आप किसी भी इतिहास अथवा पुराण में धनवान ब्राह्मण का एक भी उदाहरण बता सकते हैं?
    श्री कृष्ण की कथा में भी निर्धन ब्राह्मण सुदामा ही प्रसिद्ध है।
    संयोगवश,श्रीकृष्ण जोकि भारत के सबसे प्रिय आराध्य देव हैं, यादव-वंश के थे, जो कि आजकल OBC के अंतर्गत आरक्षित जनजाति मानी गयी है।
    यदि ब्राह्मण वैसे ही घमंडी थे जैसे कि उन्हें बताया जाता है, तो यह कैसे सम्भव है कि उन्होंने अपने से नीची जातियों के व्यक्तियों को भगवान् की उपाधि दी और उनकी अर्चना पूजा की स्वीकृति भी?(उस सन्दर्भ में यदि ईश्वर ब्राह्मण की कृति हैं जैसा की कुछ मुर्ख कहते हैं)
    देवों के देव महादेव शिव को पुराणों के अनुसार किराट जाति का कहा गया है, जो कि आधुनिक व्यवस्था में ST की श्रेणी में पाए जाते हैं

    दूसरों का शोषण करने के लिए शक्तिशाली स्थान की, अधिकार-सम्पन्न पदवी की आवश्यकता होती है। जबकि ब्राह्मणों का काम रहा है या तो मन्दिरों में पुजारी का और या धार्मिक कार्य में पुरोहित का और या एक वेतनहीन गुरु(अध्यापक) का। उनके धनार्जन का एकमात्र साधन रहा है भिक्षाटन। क्या ये सब बहुत ऊंची पदवियां हैं? इन स्थानों पर रहते हुए वे कैसे दूसरे वर्गों का शोषण करने में समर्थ हो सकते हैं?
    एक और शब्द जो हर कथा कहानी की पुस्तक में पाया जाता है वह है – ‘निर्धन ब्राह्मण’ जो कि उनका एक गुण माना गया है। समाज में सबसे माननीय स्थान सन्यासी ब्राह्मणों का था, और उनके जीवनयापन का साधन भिक्षा ही थी। (कुछ विक्षेप अवश्य हो सकते हैं, किंतु हम यहाँ साधारण ब्राह्मण की बात कर रहे हैं।)
    ब्राह्मणों से यही अपेक्षा की जाती रही कि वे अपनी जरूरतें कम से कम रखें और अपना जीवन ज्ञान की आराधना में अर्पित करें। इस बारे में एक अमरीकी लेखक आलविन टोफलर ने भी कहा है कि ‘हिंदुत्व में निर्धनता को एक शील माना गया है।’
    सत्य तो यह है कि शोषण वही कर सकता है जो समृद्ध हो और जिसके पास अधिकार हों
    अब्राह्मण को पढने से किसी ने नहीं रोका। श्रीकृष्ण यदुवंशी थे, उनकी शिक्षा गुरु संदीपनी के आश्रम में हुई, श्रीराम क्षत्रिय थे उनकी शिक्षा पहले ऋषि वशिष्ठ के यहाँ और फिर ऋषि विश्वामित्र के पास हुई। बल्कि ब्राह्मण का तो काम ही था सबको शिक्षा प्रदान करना। हां यह अवश्य है कि दिन-रात अध्ययन व अभ्यास के कारण, वे सबसे अधिक ज्ञानी माने गए,
    और ज्ञानी होने के कारण प्रभावशाली और आदरणीय भी। इसके कारण कुछ अन्य वर्ग उनसे जलने लगे, किंतु इसमें भी उनका क्या दोष
    यदि विद्या केवल ब्राह्मणों की पूंजी रही होती तो वाल्मीकि जी रामायण कैसे लिखते और तिरुवलुवर तिरुकुरल कैसे लिखते?
    और अब्राह्मण संतो द्वारा रचित इतना सारा भक्ति-साहित्य कहाँ से आता? जिन ऋषि व्यास ने महाभारत की रचना की वे भी एक मछुआरन माँ के पुत्र थे। इन सब उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि ब्राह्मणों ने कभी भी विद्या देने से मना नहीं किया।

    जिनकी शिक्षायें हिन्दू धर्म में सर्वोच्च मानी गयी हैं, उनके नाम और जाति यदि देखी जाए, तो वशिष्ठ, वाल्मीकि, कृष्ण, राम, बुद्ध, महावीर, तुलसीदास, कबीरदास, विवेकानंद आदि, इनमें कोई भी ब्राह्मण नहीं। तो फिर ब्राह्मणों के ज्ञान और विद्या पर एकाधिकार का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता! यह केवल एक झूठी भ्रान्ति है जिसे गलत तत्वों ने अपने फायदे के लिए फैलाया, और इतना फैलाया कि सब इसे सत्य मानने लगे।
    जिन दो पुस्तकों में वर्ण(जाति नहीं) व्यवस्था का वर्णन आता है उनमें पहली तो है मनुस्मृति जिसके रचियता थे मनु जो कि एक क्षत्रिय थे, और दूसरी है श्रीमदभगवदगीता जिसके रचियता थे व्यास जो कि निम्न वर्ग की मछुआरन के पुत्र थे। यदि इन दोनों ने ब्राह्मण को उच्च स्थान दिया तो केवल उसके ज्ञान एवं शील के कारण, किसी स्वार्थ के कारण नहीं।

    ब्राह्मण तो अहिंसा के लिए प्रसिद्ध हैं।
    पुरातन काल में जब कभी भी उन पर कोई विपदा आई, उन्होंने शस्त्र नहीं उठाया, क्षत्रियों से सहायता माँगी।
    बेचारे असहाय ब्राह्मणों को अरब आक्रमणकारियों ने काट डाला, उन्हें गोवा में पुर्तगालियों ने cross पर चढ़ा कर मारा, उन्हें अंग्रेज missionary लोगों ने बदनाम किया, और आज अपने ही भाई-बंधु उनके शील और चरित्र पर कीचड उछल रहे हैं। इस सब पर भी क्या कहीं कोई प्रतिक्रिया दिखाई दी, क्या वे लड़े, क्या उन्होंने आन्दोलन किया?
    ओरंगजेब ने बनारस, गंगाघाट और हरिद्वार में १५०,००० ब्राह्मणों और उनके परिवारों की ह्त्या करवाई, उसने हिन्दू
    ब्राह्मणों और उनके बच्चों के शीश-मुंडो की इतनी ऊंची
    मीनार खडी करी जो कि दस मील से दिखाई देती थी, उसने उनके जनेयुओं के ढेर लगा कर उनकी आग से अपने हाथ सेके। किसलिए, क्योंकि उन्होंने अपना धर्म छोड़ कर इस्लाम को अपनाने से मना किया। यह सब उसके इतिहास में दर्ज़ है।
    क्या ब्राह्मणों ने शस्त्र उठाया? फिर भी ओरंगजेब के वंशज हमें भाई मालूम होते हैं और ब्राह्मण देश के दुश्मन?
    यह कैसा तर्क है, कैसा सत्य है?
    कोंकण-गोवा में पुर्तगाल के वहशी आक्रमणकारियों ने निर्दयता से लाखों कोंकणी ब्राह्मणों की हत्या कर दी क्योंकि उन्होंने ईसाई धर्म को मानने से इनकार किया। क्या आप एक भी ऐसा उदाहरण दे सकते हो कि किसी कोंकणी ब्राह्मण ने किसी पुर्तगाली की हत्या की? फिर भी पुर्तगाल और अन्य यूरोप के देश हमें सभ्य और अनुकरणीय लगते हैं और ब्राह्मण तुच्छ! यह कैसा सत्य है?
    (जब पुर्तगाली भारत आये, तब St. Xavier ने पुर्तगाल के राजा को पत्र लिखा “यदि ये ब्राह्मण न होते तो सारे स्थानीय जंगलियों को हम आसानी से अपने धर्म में परिवर्तित कर सकते थे।” यानि कि ब्राह्मण ही वे वर्ग थे जो कि धर्म परिवर्तन के मार्ग में बलि चढ़े। जिन्होंने ने अपना धर्म छोड़ने की अपेक्षा मर जाना बेहतर समझा। St. Xavier को ब्राह्मणों से असीम घृणा थी, क्योंकि वो उसके रास्ते का काँटा थे,
    हजारों की संख्या में गौड़ सारस्वत कोंकणी ब्राह्मण उसके अत्याचारों से तंग हो कर गोवा छोड़ गए, अपना सब कुछ गंवा कर। क्या किसी एक ने भी मुड़ कर वार किया? फिर भी St. Xavier के नाम पर आज भारत के हर नगर में स्कूल और कॉलेज हैं और भारतीय अपने बच्चों को वहां पढ़ाने में गर्व अनुभव करते हैं
    इनके अतिरिक्त कई हज़ार सारस्वत ब्राह्मण काश्मीर और गांधार के प्रदेशों में विदेशी आक्रमणकारियों के हाथों मारे गए। आज ये प्रदेश अफगानिस्तान और पाकिस्तान कहलाते हैं,
    और वहां एक भी सारस्वत ब्राह्मण नहीं बचा है। क्या कोई एक घटना बता सकते हैं कि इन प्रदेशों में किसी ब्राह्मण ने किसी विदेशी की हत्या की? हत्या की छोडिये, क्या कोई भी हिंसा का काम किया?
    और आधुनिक समय में भी इस्लामिक आतंकवादियों ने काश्मीर घाटी के मूल निवासी ब्राह्मणों को विवश करके काश्मीर से बाहर निकाल दिया।
    ५००,००० काश्मीरी पंडित
    अपना घर छोड़ कर बेघर हो गए, देश के अन्य भागों में शरणार्थी हो गये, और उनमे से ५०,००० तो आज भी जम्मू और दिल्ली के बहुत
    ही अल्प सुविधायों वाले अवसनीय तम्बुओं में रह रहे हैं। आतंकियों ने अनगनित ब्राह्मण पुरुषों को मार डाला
    और उनकी स्त्रियों का शील भंग किया। क्या एक भी पंडित ने शस्त्र उठाया, क्या एक भी आतंकवादी की ह्त्या की? फिर भी आज ब्राह्मण शोषण और अत्याचार का पर्याय माना जाता है और मुसलमान आतंकवादी वह भटका हुआ इंसान जिसे क्षमा करना हम अपना धर्म समझते हैं। यह कैसा तर्क है?

    माननीय भीमराव आंबेडकर जो कि भारत के सम्विधान के रचियता थे, उन्होंने एक मुस्लमान इतिहासकार का सन्दर्भ देकर लिखा है कि धर्म के नशे में पहला काम जो पहले अरब घुसपैठिय मोहम्मद बिन कासिम ने किया, वो था ब्राह्मणों का खतना। “किंतु उनके मना करने पर उसने सत्रह वर्ष से अधिक आयु के सभी को मौत के घाट उतार दिया।” मुग़ल काल के प्रत्येक घुसपैठ, प्रत्येक आक्रमण और प्रत्येक धर्म-परिवर्तन
    में लाखों की संख्या में धर्म-प्रेमी ब्राह्मण मार दिए गए। क्या आप एक भी ऐसी घटना बता सकते हो जिसमें किसी ब्राह्मण ने किसी दूसरे सम्प्रदाय के लोगों की हत्या की हो?
    १९वीं सदी में मेलकोट में दिवाली के दिन टीपू सुलतान की सेना ने चढाई कर दी और वहां के ८०० नागरिकों को मार डाला जो कि अधिकतर मंडयम इयेंगार थे। वे सब संस्कृत के उच्च कोटि के विद्वान थे। (आज तक मेलकोट में दिवाली नहीं
    मनाई जाती।) इस हत्याकाण्ड के कारण यह नगर एक श्मशान बन गया।
    ये अहिंसावादी ब्राह्मण पूर्ण रूप से शाकाहारी थे, और सात्विक भोजन खाते थे जिसके कारण उनकी वृतियां भी सात्विक थीं और वे किसी के प्रति हिंसा के विषय में सोच भी नहीं सकते थे। उन्होंने तो अपना बचाव तक नहीं किया। फिर भी आज इस देश में टीपू सुलतान की मान्यता है। उसकी वीरता के किस्से कहे-सुने जाते हैं। और उन ब्राह्मणों को कोई स्मरण नहीं करता जो धर्म के कारण मौत के मुंह में चुपचाप चले गए।

    अब जानते हैं आज के ब्राह्मणों की स्थिति क्या आप जानते हैं कि बनारस के अधिकाँश रिक्शा वाले ब्राह्मण हैं? क्या आप जानते हैं कि दिल्ली के रेलवे स्टेशन
    पर आपको ब्राह्मण कुली का काम करते हुए मिलेंगे?
    दिल्ली में पटेलनगर के क्षेत्र में 50 % रिक्शा वाले ब्राह्मण समुदाय के हैं। आंध्र प्रदेश में ७५ % रसोइये और घर की नौकरानियां ब्राह्मण हैं। इसी प्रकार देश के दुसरे भागों में भी ब्राह्मणों की ऐसी ही दुर्गति है, इसमें कोई शंका नहीं। गरीबी-रेखा से
    नीचे बसर करने वाले ब्राह्मणों का आंकड़ा ६०% है।
    हजारों की संख्या में ब्राह्मण युवक अमरीका आदि पाश्चात्य देशों में जाकर बसने लगे हैं क्योंकि उन्हें वहां software engineer या scientist का काम मिल जाता है। सदियों से जिस समुदाय के सदस्य अपनी कुशाग्र बुद्धि के कारण समाज के शिक्षक और शोधकर्ता रहे हैं, उनके लिए आज ये सब कर पाना कोई बड़ी बात नहीं। फिर भारत सरकार को उनके सामर्थ्य की आवश्यकता क्यों नहीं ? क्यों भारत में तीव्र मति की अपेक्षा मंद मति को प्राथमिकता दी जा रही है? और ऐसे में देश का विकास होगा तो कैसे?
    कर्नाटक प्रदेश के सरकारी आंकड़ों के अनुसार वहां के
    वासियों का आर्थिक चित्रण कुछ ऐसा है: ईसाई भारतीय
    – १५६२ रू/ वोक्कालिग जन – ९१४ रू/ मुसलमान – ७९४ रू/ पिछड़ी जातियों के जन – ६८० रू/ पिछड़ी
    जनजातियों के जन – ५७७ रू/ और ब्राह्मण – ५३७ रू।
    तमिलनाडु में रंगनाथस्वामी मन्दिर के पुजारी का मासिक वेतन ३०० रू और रोज का एक कटोरी चावल है। जबकि उसी मन्दिर के सरकारी कर्मचारियों का वेतन कम से कम २५०० रू है। ये सब ठोस तथ्य हैं
    लेकिन इन सब तथ्यों के होते हुए, आम आदमी की यही धारणा है कि पुजारी
    ‘धनवान’ और ‘शोषणकर्ता’ है, क्योंकि देश के बुद्धिजीवी वर्ग ने अनेक वर्षों तक इसी असत्य को अनेक प्रकार से चिल्ला चिल्ला कर सुनाया है।
    क्या हमने उन विदेशी घुसपैठियों को क्षमा नहीं
    किया जिन्होंने लाखों-करोड़ों हिंदुओं की हत्या की और देश को हर प्रकार से लूटा? जिनके आने से पूर्व भारत संसार का सबसे धनवान देश था और जिनके आने के बाद
    आज भारत पिछड़ा हुआ third world country कहलाता है।
    इनके दोष भूलना सम्भव है तो अहिंसावादी, ज्ञानमूर्ति, धर्मधारी ब्राह्मणों को किस बात का दोष लगते हो
    कब तक उन्हें दोष देते जाओगे?
    क्या हम भूल गए कि वे ब्राह्मण समुदाय ही था जिसके कारण हमारे देश का बच्चा बच्चा गुरुकुल में बिना किसी भेदभाव के समान रूप से शिक्षा पाकर एक योग्य नागरिक बनता था? क्या हम भूल गए कि ब्राह्मण ही थे जो ऋषि मुनि कहलाते थे, जिन्होंने विज्ञान को अपनी मुट्ठी में कर रखा था?
    भारत के स्वर्णिम युग में ब्राह्मण को यथोचित सम्मान दिया जाता था और उसी से सामाज में व्यवस्था भी ठीक रहती थी। सदा से विश्व भर में जिन जिन क्षेत्रों में भारत का नाम सर्वोपरी रहा
    है और आज भी है वे सब ब्राह्मणों की ही देन हैं, जैसे कि अध्यात्म, योग, प्राणायाम, आयुर्वेद आदि। यदि ब्राह्मण जरा भी स्वार्थी होते तो यह सब अपने था अपने कुल के लिए ही रखते
    दुनिया में मुफ्त बांटने की
    बजाए इन की कीमत वसूलते। वेद-पुराणों के ज्ञान-विज्ञान को अपने मस्तक में धारने वाले व्यक्ति ही ब्राह्मण कहे गए और आज उनके ये सब योगदान भूल कर हम उन्हें दोष देने में लगे है।
    जिस ब्राह्मण ने हमें मन्त्र दिया ‘वसुधैव कुटुंबकं’ वह
    ब्राह्मण विभाजनवादी कैसे हो सकता है? जिस ब्राह्मण ने कहा ‘लोको सकलो सुखिनो भवन्तु’ वह किसी को दुःख कैसे पहुंचा सकता है? जो केवल अपनी नहीं , केवल परिवार, जाति, प्रांत या देश की नहीं बल्कि सकल जगत की मंगलकामना करने का उपदेश देता है, वह ब्राह्मण स्वार्थी कैसे हो सकता है?

    इन सब प्रश्नों को साफ़ मन से, बिना पक्षपात के विचारने की आवश्यकता है, तभी हम सही उत्तर जान पायेंगे।
    आज के युग में ब्राह्मण होना एक दुधारी तलवार पर चलने के समान है। यदि ब्राह्मण अयोग्य है और कुछ अच्छा कर नहीं पाता तो लोग कहते हैं कि देखो हम तो पहले ही जानते थे कि इसे इसके पुरखों के कुकर्मों का फल
    मिल रहा है। यदि कोई सफलता पाता है तो कहते हैं कि इनके तो सभी हमेशा से ऊंची पदवी पर बैठे हैं, इन्हें किसी प्रकार की सहायता की क्या आवश्यकता? अगर किसी ब्राह्मण से कोई अपराध हो जाए फिर तो कहने ही क्या, सब आगे पीछे के सामाजिक पतन का दोष उनके सिर पर मढने का मौका सबको मिल जाता है।
    और ब्राह्मण बेचारा इतने दशकों से अपने अपराधों की व्याख्या सुन सुन कर ग्लानि से इतना झुक चूका है कि वह कोई प्रतिक्रिया भी नहीं करता, बस चुपचाप सुनता है और अपने प्रारब्ध को स्वीकार करता है।
    बिना दोष के भी दोषी बना घूमता है आज का ब्राह्मण। नेताओं के स्वार्थ, समाज के आरोपों, और देशद्रोही ताकतों के षड्यंत्र का शिकार हो कर रह गया है ब्राह्मण। बहुत से ब्राह्मण अपने पूर्वजों के व्यवसाय को छोड़ चुके हैं आज। बहुत से तो संस्कारों को भी भूल चुके है। अतीत से कट चुके हैं किंतु वर्तमान से उनको जोड़ने वाला कोई नहीं। ऐसे में भविष्य से क्या आशा.. करें

    _/\_

    महेंद्र तिवारी

  5. Divide hindu community and rule the country. This is happening from past 60 years by Congress. This is simple rule to destroy Bharat. I request to all of you to understand such type of propaganda and don’t believe Dilip mandal like peoples who wants to divide Hindu community by getting foreign funding. If Hindu community will united then our country will grow in faster way.

    And Dillip mandal, better to do something for the country and do something to bring unity between the Hindu community instead of writing nonsense blog which is against our country.

  6. जो पद योग्य है वो पदासीन है सालो से कोटा लेके परिश्रम की आदत नहीं रही देश की तरक्की हेतु ऐसे विभाजन कारी विचार ठीक नहीं।

  7. Mr.dilip mondol ji…..aap jaise log salon se aarakhsan ki baisakhi leke ghum rhe ho fir bhi brahmano k varchasav ko nhi hila paye…..ab kya chahte ho ki har jgh 100% aarakhsan ho aap logo k liye…..aakhir kuch to khasiyat hoti h Brahman aur rajputo m ki wo alpjan hote hue bhi aap jaise bahujano p raaj karte h.. aur us khasiyat ka Nam h sikhsha …..fact ko mano aatankwadi na bnao yar logo ko aise

  8. आप एक पत्रकार हैं और वर्तमान परिवेश में पत्रकार को क्या कहा जाता है और क्यों कहा जाता है आप भी अच्छी तरह जानते हैं। रही बात एक हीं जाती के इतने मंत्री क्यों? इसका जवाब सीधा है ये आरक्षण की बैसाखी लेकर योग्यता हासिल नहीं किया हैें, अगर प्रतिस्पर्धा हासिल करना है तो आरक्षण हटा कर करें ताकि आने वाली पीढ़ी सही और मजबूत मानसिकता का होगा जातिवाद से उपर उठकर देशहित में लिखें ताकि बेहतर समाज का निर्माण हो सके।

  9. Why You Guys In India still speak about Castes? Cant you Speak and support for equality, talents and knowledge? I think what reservation did is it added some fuel in the cast based hierarchy by providing reservation to the backward cast though it’s intention was purely for upgradation of backward caste. I think if added some skills, knowledge & information programs for backward caste instead of reservation it would help them more to have good reputation and upgradation in the society. Why you cant support talents and knowledge instead of caste?

  10. ये जो ब्राहम्न्वाद है न ! इसी से तुम लोगों की रोजी रोटी चलती है । दो कौड़ी के इस विचारक ने रिफ्रेन्स भी दिया तो इटली वाले अपने बाप के । इस विषय पर क्या भारतीय अनुसंधान की कमी हो गयी । ये भी किसी ब्राह्मण के चुलुक पादुका में नतमस्तक ही रहा होगा । मानसिक गुलामी के पैरोकार MNC के पिछलग्गू इन विचारकों ने देश का बेड़ा गर्क कर दिया है । इन्हीं लोगों ने आज गरीबों को गरीबी के दलदल में धंसा दिया है ।

  11. जिन्हें इस बात का एहसास हो गया है कि उनके साथ किसी न किसी स्तर पर, किसी न किसी के व्दारा, कहीं न कहीं पक्षपात होता है, हो रहा है, किया जाता है, किया जा रहा है। उनका नुकसान हो रहा है, क्षति पहुंचायी जा रही है। यह प्राकृतिक नहीं है, कृत्रिम है। व्यवस्थित ढंग से, षड्यन्त्रपूर्वक ऐसा हो रहा है, किया जा रहा है। उन्हें अपने विरुध्द किये जा रहे, हो रहे व्यवस्थित षड्यन्त्र के सम्बन्ध ऐसा समाधान हो गया है। उन्होंने ऐसे षड्यन्त्रकारी गिरोहों का भी पता लगा लिया, उन्हें ढ़ूढ़ लिया है। ऐसी स्थिति में वह सभी लोग, जिनका किसी न किसी स्तर पर, किसी न किसी के व्दारा, कहीं न कहीं पर पक्षपात होता है, हो रहा है, किया जाता है, किया जा रहा है। उनका नुकसान हो रहा है, क्षति पहुंचायी जा रही है। यह प्राकृतिक रुप से नहीं है, कृत्रिम रुप में है, व्यवस्थित ढंग से, षड्यन्त्रपूर्वक ऐसा हो रहा है, किया जा रहा है। उन्हें अपनी समान समस्याओं, दुखों, तकतीफों के निराकरण के लिये लामबन्द होना चाहिये, एकजुट होना चाहिए, एकमत होना चाहिए। हम यह भी भली-भांति जानते हैं कि हममें कुछ करणोंवश आपस में एका नहीं हैं। यही आपसी एका, एकता, दुराव, मत-भेद, हमारी सबसे बड़ी कमी है, कमजोरी है, दोष है, दुर्गुण है जिसके कारण हम नुकसान में हैं। हमें नुकासान पहुंचाने वाला अपने षड्यन्त्र में सफल है। वह संख्या बल में नुकसान उठाने वालों, क्षति में जीने वालों, घाटे में रहने वालों से बहुत कम है, पीछे है, फिर भी वह हमें नुकसान पहुंचाने में सफल है। उसमें ऐसी कोई विशिष्टि नहीं हैं। उसमें कोई ज्यादा योग्यता नहीं है जिसके कारण वह हम पर भारी है, आगे है। वह केवल और केवल षड्यन्त्र के कारण आगे है और कोई दूसरा, तीसरा या चौथा कारण नहीं है।

    हमें अपनी उन तमाम कमियों को दर-किनार करते हुये, अलग करते हुये, छोड़ते हुए, अपने दुःखों, तकलीफों, समस्याओं, नुकसानों, हानियों की भरपाई के लिए, एक होना होगा, एकत्र होना होगा, एकमत होना होगा, साथ-साथ, कदम से कदम मिलाकर चलना होगा, आगे बढ़ना होगा। आगे आने वाले समय में हर ऐसे सुअवसर पर अपनी समान समस्याओं के हित-साधन हेतु लोक-कल्याणकारी विचार, भावना, सोच के साथ एकमत होना होगा। हमें ऐसा ही करना होगा और हमें ऐसा ही एकमत होकर साथ-साथ, कदम से कदम मिलाकर, एकमत रहना चाहिए, निर्णय लेना चाहिऎ, तभी हम अपने दुःखों का अंत करने में सफल होंगे, कर सकेंगे…….

  12. In my opinion Author has not justified his writing to any extent. He is talking about taking out Castism in one hand and talking about the Reservation on other. This reservation has played a big game to create an imbalanced environment along the people from different communities and castes. Once our government and society start treating all the citizen in one platform with one policy this castism will be eradicated from the root.

  13. Paagal ho gaye ho yaar kya?
    Jo jis pad ke liye laayak hai usi pe wo baitha hai.
    Brahman apni budhdhi ki wajah se hi itna aage hai aur log unhi ko aise pad ka bhaar sompte hai. Brahman apni Vichar shakti ke kaaran hi itne aage hai aur hamesha rahenge. Aap jaise tuchche logo ki soch ki unhe parwah nahi hai. Wo apne me mast hai ji. Aap hi aisa nimn kaksha ka vichar apne mann me leke aa sakte ho. Dhanyavaad aapka Brahmano ko apna sthaan ek baar fir bataane ke liye. Namaskaar hai ji aapki is soch ko…

  14. Dilip mandal jaise….F**ker ko kawan likhne deta hai……Innko khujli hai means…Need solutions …Chutiye…..Padhne ke time me….Gar marwate hooo….aur baat krete hoo hamko…Cabinet me Jagah nahi hai…..!!

  15. फाल्तु लेख्ता हे काम नहि हे क्या।किस्ने बना दिया पत्रकार जी।

  16. if you could produce any proof of any type of attrocity from any Muslim ruler upon Hindus before 1857 please show.your all facts are from British historians books who,s main policy was divide and rule dozens of Hindu historians are of the view that there is noT a single incident of communal right before British ruler. Thanks

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