यहां नोटबंदी फेल होने पर तानाशाह राष्ट्रपति ने वित्तमंत्री को फांसी देकर देश से मांगी थी माफ़ी

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भारत में 8 नवंबर 2017 को नोटबंदी के एक साल हो गए. सत्ता पक्ष इसके फायदे गिनाने में लगा है. विपक्ष इसकी कमियां गिना रहा है. सभी एक दूसरे के ऊपर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं. आम लोगों में भी कुछ नोटबंदी का समर्थन कर रहे हैं, तो कुछ विरोध में लगे हैं और ऐसा करते हुए उन्होंने एक साल निकाल दिए हैं. लेकिन एक देश ऐसा भी है, जहां नोटबंदी सफल नहीं हुई थी और उस देश की जनता खाने के लिए मोहताज हो गई थी. नतीजा ये हुआ था कि अर्थव्यवस्था में सुधार की सिफारिश करने वाले वित्त मंत्री को मौत की सजा दे दी गई थी और देश के तानाशाह राष्ट्रपति ने देशवासियों से माफी मांग ली थी.

ये देश का उत्तरी कोरिया. वही उत्तरी कोरिया, जो इस समय अपने परमाणु बमों को बनाने और उनको चलाने की धमकी देकर पूरी दुनिया में दहशत कायम किए हुए है. वही उत्तरी कोरिया, जिसपर कई देशों ने तमाम प्रतिबंध लगाए हैं, इसके बावजूद वो अपनी ताकत को बढ़ाते जा रहा है. इसी उत्तरी कोरिया ने साल 2009 में 30 नवंबर को एक फैसला लिया था. इसके तहत दो मुद्रा चलन में थी, उसे बंद कर दिया गया था. इतना ही नहीं, उस करंसी की कीमत में कमी कर दी गई थी और नोट के अंतिम के दो जीरो कम कर दिए थे. यानी जिस नोट की कीमत पहले 1000 रुपये हुआ करती थी, उसकी कीमत 10 रुपये हो गई. नए नोट जारी कर दिए गए थे और पुराने नोटों को बदलने के लिए एक सप्ताह से भी कम का वक्त दिया गया था. इसके अलावा ये भी तय किया गया कि एक आदमी बस एक लाख वोन (वोन कोरिया की मुद्रा है) की करंसी ही बदल सकता है. ये फैसला लेने वाले थे उस वक्त के उत्तरी कोरिया के राष्ट्रपति किम जोंग-इल. सत्ताधारी वर्कर्स पार्टी के किम जोंग-इल उत्तरी कोरिया के अभी के राष्ट्रपति और पूरी दुनिया में अपनी तानाशाही के लिए जाने जाने वाले किम जोंग-उन के पिता थे.

किम जोंग-उन ने इस व्यवस्था को लागू करते हुए भी कुछ ऐसे ही तर्क दिए थे, जो भारत में दिए गए थे. किम जोंग ने कहा था कि ऐसा करने से अर्थव्यवस्था नियंत्रित हो जाएगी और कालाबाजारी पर रोक लग जाएगी. अतिरिक्त पैसा खत्म हो जाएगा लोगों के बीच बराबरी आ जाएगी. हालांकि ऐसा नहीं हुआ. इस फैसले के बाद अर्थव्यवस्था सुधरने के बजाए और भी बिगड़ गई. पैसे बदलने के लिए लोग अपने घरों की ओर भागे. इसकी वजह से रेलवे स्टेशनों पर भारी भीड़ हो गई. बाजारों में इतनी भीड़ हो गई कि बाजर बंद करने पड़े. इसके अलावा 2009-10 में उत्तरी कोरिया में खेती भयानक संकट से गुजर रही थी. अनाज का उत्पादन बिल्कुल ही घट गया था. ऐसे में मुद्रा के अवमूल्यन ने परेशानी और बढ़ा दी और लोग दाने-दाने को मोहताज हो गए. इसके अलावा नार्थ कोरिया ने जो परमाणु परीक्षण किए थे, उसकी वजह से उसपर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगे थे और बाहर से मिलने वाला अनाज भी बंद हो गया था. एक रिपोर्ट के मुताबिक इस नए नियम के बाद उत्तरी कोरिया में भूख की वजह से हजारों लोगों की मौत हो गई.

एक रिपोर्ट की मानें तो जब हालात खराब होने लगे, किम जोंग-इल लोगों के सामने आए और उन्होंने पूरे देश के लोगों के माफी मांगी. रिपोर्ट्स बताती हैं कि किम जोंग-इल ने इस व्यवस्था को लागू करने वाले उत्तरी कोरिया के वित्त मंत्री पाक नाम-जी को बर्खास्त कर दिया और उन्हें सरेआम फांसी दे दी गई. एक और रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से बिगाड़ने के आरोप में फायरिंग स्क्वॉड ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी. हालांकि लोग ये मानते रहे कि पाक नाम-जी को बलि का बकरा बनाया गया है और इसके असली कर्ता-धर्ता किम जोंग-इल ही हैं.

courtesy: lallantop

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