तो तूने हराम की औलाद से बजरंगी का वंश चलाने की ठानी है?- कुच्ची का कानून

0
1249

‘वाह! दूसरे से बच्चा जन्माकर अपने आदमी की चाहत पूरी कर रही है?’

‘तो क्या करती बाबा? वे तो जन्माने के लिए अब सरग से लौटकर आने से रहे और अकेले मैं जनमा नहीं सकती थी.’
‘तो तूने हराम की औलाद से बजरंगी का वंश चलाने की ठानी है?’
‘उनका चले न चले, मेरा तो चलेगा.’
‘अरे मूर्ख, वंश मां से नहीं, बाप की बूंद और नाम से चलता है.’
‘ऐसा क्यों है बाबा? पेट में तो नौ महीना सेती है महतारी. बाप तो बूंद देकर किनारे हो जाता है.’
‘इतनी दूर तैरने से पार नहीं पाएगी, लड़की. तू इस गांव की बहू है. तूने क्यों नहीं सोचा कि तेरे इस कदम से गांव की नाक कटती है?’
‘मेरी गोद भरने से, मुझे सहारा मिलने से गांव की नाक कैसे कट जाएगी बाबा? क्या मेरे भूखे सोने से गांव के पेट में कभी दर्द हुआ? जेठ की धमकी से डरकर जब हम तीनों परानी रात भर बारी-बारी घर के भीतर पहरेदारी करते हैं, तो क्या गांव की नींद टूटती है? जब यह बहाने बनाकर मुझे और मेरे ससुर को गरियाता-धमकाता है, तो क्या गांव उसे रोकने आता है? जब मेरी भूख पूरे गांव की भूख नहीं बनती, मेरा डर पूरे गांव का डर नहीं बनता, मेरा दुःख-दर्द पूरे गांव का दुःख-दर्द नहीं बनता, तो मेरे किए हुए किसी काम से पूरे गांव की नाक कैसे कट जाएगी?’

कहानी संग्रह : कुच्ची का कानून

लेखक : शिवमूर्ति

प्रकाशक : राजकमल

कीमत : 150 रुपये

courtesy: satyagrah.scroll

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here