क्या ये फिल्म गुजरात के डॉन लतीफ की है कहानी जिसका नाम सुनते ही अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद खड़ा होगया

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13 दिसंबर 1992. दुबई में दाऊद इब्राहिम का घर. मैंने (लतीफ) रईस (दाऊद का राइट हैंड) से पूछा, दाऊद अचानक क्यों खड़ा हो गया, वो कौन लोग हैं जिससे मिलने दाऊद खड़ा हुआ? रईस ने कहा, पाकिस्तान के एम्बेसेडर. लंच के बाद आए मेहमानों को विदा करते दाऊद ने कहा हथियारों और सामान (आर.डी.एक्स) का प्रबंध हो गया है. (इसका बाद में मुंबई धमाकों के वक्त इस्तेमाल हुआ).

ये बयान है गुजरात के कुख्यात डॉन अब्दुल लतीफ़ का जो उसने गुजरात एटीएस को पूछताछ में दिया था. वैसे तो दाऊद के खास रईस नाम के शख्स का आज ही रिलीज हुई शाहरुख की फिल्म रईस से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन दावा किया जा रहा है कि जिसने रईस से सवाल पूछा था, यानि अब्दुल लतीफ, उसी की जिंदगी पर ये फिल्म बनी है.

क्या ‘रईस’ अहमदाबाद के डॉन लतीफ़ की जिंदगी पर आधारित फिल्म है? शाहरुख की इस फिल्म की चर्चा फिल्म बनने से लेकर आज रिलीज होने तक लगातार जारी है. ऐसे में यह  जानना जरूरी बन पड़ता है कि आखिर ये शख्स कौन था जो इतना चर्चा बटोर रहा है. आखिर क्यों इस पूरी कहानी में दाऊद का नाम भी आ रहा है?

लतीफ की कहानी अहमदाबाद के अति संवेदनशील इलाके दरियापुर से शुरू होती है. यहां अब्दुल वहाब शेख का परिवार सालों से रहता था. 70 का शुरुआती दशक. अब्दुल वहाब के 20 साल के बेटे अब्दुल लतीफ़ की नई-नई शादी हुई थी. अब्दुल लतीफ के सिर पर अब जिम्मेदारी थी. उसने रिक्शा चलाना शुरू किया, लेकिन कुछ करने की लालसा दिल में थी. सिर पर जुनून सवार था. नुक्कड़ में ही जुए का अड्डा था. थोड़े पैसे कमाने के चक्कर में उसे जुए की लत लग गई. पैसे कमाने की बजाय गंवाने लगा. परिवार में माहौल तंग होने लगा. परिवार की परवाह किए बिना अब्दुल लतीफ ने रफीक के साथ हाथ मिलाकर शराब बेचना शुरू किया. दोनों शुरू में वासु सिन्धी नाम के शराब व्यापारी से शराब खरीदकर बेचते थे. लेकिन वो महंगा पड़ता था. लतीफ ने राजस्थान के कैलाश जैन से शराब खरीदना शुरू किया. वो सस्ती शराब बेचता था इसलिए धीरे-धीरे शराब का कारोबार पर पकड़ बनने लगी. राजस्थान से हर रोज दो ट्रक शराब गैर कानूनी रूप से मंगवाई जाती थी और उसे बाद में पूरे अहमदाबाद में बेचा जाता था. हर ट्रक पर कम से कम 15 हज़ार रुपये मिलते थे.

बात है 1982 की. मुंबई में दाऊद इब्राहिम के भाई शब्बीर की हत्या करके आमिर खान और आलम खान अहमदाबाद चले आए जिन्हें लतीफ ने आसरा दिया. इस तरह जाने अनजाने लतीफ दाऊद से दुश्मनी कर बैठा. वडोदरा में आलमजेब, कंवलजीत थे तभी दाऊद ने अपने गैंग साथ दोनों पर हमला किया. लेकिन इस गैंगवार में दाऊद खुद जख्मी हो गया और उसे वड़ोदरा के सयाजी राव अस्पताल में भर्ती कराया गया. दाऊद पर आर्म्स एक्ट के तहत मामला दर्ज हुआ और उसे अहमदाबाद के साबरमती जेल भेजा गया. दाऊद वडोदरा कोर्ट से निकलकर पुलिस के साथ प्राइवेट कार में आ रहा था तभी दाऊद को निपटाने के लिए लतीफ की निगरानी में ताबड़तोड़ हमला किया गया. हालांकि दाऊद हमले में बच गया.

बढ़ता गया लतीफ़ का आतंक

अब अब्दुल लतीफ़ पर आर्म्स एक्ट का मामला दर्ज हुआ और उसे साबरमती जेल भेजा गया. लतीफ़ का आतंक बढ़ता जा रहा था. एक के बाद मामले दर्ज होते जा रहे थे. लतीफ़ को जेल में रखने की पुलिस की चाल कुछ ही समय के लिए सफल रही. 1985 में लतीफ़ अपनी मां की मौत पर पैरोल पर बाहर आया. उस समय अहमदाबाद नगर निगम के चुनाव थे. तभी लतीफ़ ने राजनीति में कदम रखा और पांच वार्ड से खड़ा हुआ. इसे लतीफ़ का डर समझो  या गुर्गों का प्रचार, लतीफ़ पांचों वार्ड से चुनाव जीत गया. लतीफ़ ने जेल से बाहर आने के लिए जानेमाने वकील राम जेठमलानी का सहारा लिया. आखिर सुप्रीम कोर्ट से छूटकर वो बाहर आ गया.

इस दौरान दाऊद दुबई शिफ्ट हो चुका था. उसे अच्छे लोगों की जरुरत थी. अंडरवर्ल्ड में करीम लाला का मान सम्मान हर किसी को रखना पड़ा था. करीम लाला के कहने पर दाऊद और लतीफ़ के बीच समझौता हुआ. अक्तूबर 1985 को लतीफ़ दुबई पहुंचा. डेरा दुबई में महबूब बिल्डिंग में उसे मेहमान की तरह ले जाया गया. दाऊद के साथ उसका भाई शकील, सलेम सभी थे. मध्यस्थता कराने के लिए सुलतान शाह बाचा थे. यहां कुरान पर हाथ रखते हुए दाऊद और लतीफ़ ने एक दूसरे के खिलाफ गिले-शिकवे भूलकर काम करने की कसम खाई. दाऊद और लतीफ़ दोनों गले मिले. यह लतीफ़ का दबदबा था कि दाऊद को झुकना पड़ा. दाऊद ने लतीफ़ से सोने की स्मगलिंग करने के लिए कहा.

लतीफ़ जब भारत लौटा तो दाऊद ने उसका इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. सबसे पहले डेविड नाम के शख्स को अहमदाबाद के आम्रपाली होटल में मरवाया. दाऊद डेविड के आखिरी लम्हों को सुनना चाहता था. इसलिए लतीफ़ को फोन कर उसे कांफ्रेंस में रखा. दाऊद डेविड से बात कर रहा था और दूसरे छोर पर लतीफ़ था. डेविड से बात चालू थी उसी वक्त लतीफ़ के गुर्गे वहां पहुंचे और डेविड को मार गिराया. दाऊद उस दिन खूब खुश हुआ. डेविड को इसलिए मारा गया क्योंकि उसने गवली से हाथ मिलाया था और गवली ने दाऊद को मारने के लिए डेविड को सुपारी दी थी.

लतीफ़ का खूनी खेल

यहीं से लतीफ़ ने खूनी खेल खेलना शुरू किया. उसके शराब के कारोबार में जो भी बीच में आए उसे लतीफ़ ने गोली मारना शुरू कर दिया. अब लतीफ़ आतंक का पर्याय बन चुका था. देखते ही देखते लतीफ़ की गैंग में 100 से ज्यादा गुर्गे हो चुके थे. शराब माफिया पर अपना वर्चस्व जमाने के लिए उसने एक के बाद एक सात हत्याएं अपने गुर्गो से करवाई. लतीफ़ के लोग पुलिस को भी नहीं छोड़ रहे थे. सरेआम एक पी.एस.आई की हत्या के बाद पुलिस महकमे भी मानो सन्नाटा पसर गया था.

दाऊद के कहने पर लतीफ़ ने सोने की स्मगलिंग शुरू की. दाऊद के ख़ास मम्मू मियां से हाथ मिलाया. स्मगलिंग में दाऊद ने 25 लाख रुपये निवेश किए जबकि पहली कमाई एक करोड़ 24 लाख थी. लतीफ़ को यह धंधा पसंद आ गया. शराब, फिरौती, अपहरण, हत्या के साथ-साथ स्मगलिंग, लतीफ़ की तूती बोलने लगी.

हंसराज की हत्या बनी मुसीबत

लतीफ़ के जीवन में अहम मोड़ आया तीन अगस्त 1992 को. लतीफ़ शराब के कारोबार में साम, दाम, दंड, भेद सारे उपाय अपनाकर एकछत्र राज चला रहा था. इसी दौरान हंसराज त्रिवेदी नाम के शराब माफिया ने लतीफ़ से शराब खरीदने के लिए मना कर दिया. लतीफ़ के गुर्गो ने उसे पहले समझाया, फिर धमकाया. फिर भी नहीं माना तो मारने का प्लान बनाया. हंसराज के ओढव इलाके के राधिका जिमखाने में होने की पक्की खबर मिलते ही लतीफ़ अपने साथियों को लेकर निकला. दो गाड़ियों में अलग-अलग लोग थे. लतीफ़ पीछे वाली गाड़ी में था. जब ये लोग राधिका जिमखाना पर पहुंचे तो लतीफ़ नीचे ही रहा. उसके लोग ऊपर गए तो नौ लोग पत्ते खेल रहे थे. लतीफ़ का शार्प शूटर शरीफ खान नौ लोगों में पहचान नहीं पाया कि कौन हंसराज है. शरीफ ने एके 47 से अंधाधुंध गोलीबारी करते नौ लोगों को मौत के घाट उतार दिया.

यहीं से लतीफ़ के लिए दिक्कतें खड़ी हुईं. राधिका जिमखाना हत्याकांड देश के अखबारों में जगह पाने लगा. राजनीतिक दबाव बढ़ा. पुलिस ने उसके गैंग के सदस्यों को पकड़ना और मारना शुरू किया. उसके लोग पकड़े जाने लगे. केवल लतीफ़ के बेहद करीबी एक-दो साथी ही बचे. लतीफ़ अपने ठिकाने बदलता रहा. इसकी चर्चा दाऊद तक पहुंची तो उसने लतीफ़ को दुबई बुला लिया. नेपाल के रास्ते छुपते-छुपाते वो दुबई पहुंच गया. तक़रीबन  चार महीने दुबई में रहा. लेकिन वह वापिस अहमदाबाद आना चाहता था. उसकी गैरमौजूदगी में उसका गैंग बिलकुल ख़त्म होने के कगार पर था. हालांकि दुबई में बैठे-बैठे भी लतीफ़ ने वहाब के जरिए दो हत्या करवाई.

फिर वो अहमदाबाद लौटा. दाऊद ने हथियारों का एक बड़ा जखीरा भेजा जिसमैं 47 एके-47, दो एके- 56 और हजारों बुलेट राउंड्स थे. पुलिस की पकड़ और मजबूत हुई तो लतीफ़ को दोबारा सिंगापुर होकर दुबई भागना पड़ा. पूरी व्यवस्था दाऊद ने की. दुबई में लतीफ़ का मन नहीं लग रहा था. थोड़े समय वहां रुकने के बाद दिसंबर 1994  में दाऊद के मना करने पर भी वो पाकिस्तान से अटारी के  रास्ते दिल्ली आया. यहां उसने फिरौती, अपहरण, हत्या की सुपारी लेना शुरू किया. वो ज्यादा कुछ कर पाता उससे पहले ही 10 अक्तूबर 1995 को  गुजरात एटीएस, सीबीआई और दिल्ली पुलिस के जॉइंट ऑपरेशन में पकड़ा गया.

पुलिस के साथ लतीफ़ का लुकाछिपी का खेल चलता रहा. आखिर 28 नवंबर 1997 को अहमदाबाद क्राइम ब्रांच ने मुठभेड़ में उसे मार गिराया. महज 46 साल की उम्र में आतंक का पर्याय बने लतीफ़ का खौफ उसकी मौत के बाद भी एक दशक तक अहमदाबाद के इलाकों में रहा.

गरीबों का रॉबिन हुड

ये खूंखार डॉन लतीफ़ की वो कहानी है जिसे लोगों ने सुना या देखा है. लेकिन कुछ बातें ऐसी भी हैं जो उसे रॉबिन हुड करार देती है. इलाके के लोगों के लिए साल भर के लिए राशन की बात हो, चाहे मोहल्ले के किसी गरीब परिवार की बेटी की शादी हो, लतीफ़ खूब पैसे बांटता था. स्थानीय लोग लतीफ़ को भगवान मानते थे. एक किस्सा ऐसा भी है कि अपने गैंग के एक साथी की शादी में उसने एके 47 से 150 राउंड हवाई फायरिंग करके जश्न मनाया था.

अब इस कहानी के कितने पहलू रुपहले परदे पर उतारे गए हैं ये तो आपको फिल्म देखने पर ही पता चल पाएगा. लेकिन लतीफ़ के बेटे मुश्ताक को फिल्म निर्माण पर आपत्ति है. उसने हाई कोर्ट में इसे चैलेंज किया. कोर्ट ने कहा कि पहले वह फिल्म देखे उसके बाद कोर्ट का रुख करे. बहरहाल, उस इलाके के लोग जहां एक समय लतीफ़ का साम्राज्य हुआ करता था, रईस को अपने भाई की फिल्म बता रहे हैं.

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